सारंगढ़/मेसर्स ग्रीन सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग प्रा. लि. की जनसुनवाई को लेकर सोमवार को प्रशासन ने जो खेल खेला, उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की चादर उधेड़कर रख दी! बिना पंडाल, बिना माइक, बिना जनता — लेकिन भारी पुलिस बल की निगरानी में आनन-फानन में जनसुनवाई पूरी!
ग्रामीणों ने दो टूक कहा —
“जिस जगह जनता की आवाज़ सुनी जानी थी, वहाँ जनता थी ही नहीं, फिर किसकी सुनवाई हुई?”पूरा प्रभावित क्षेत्र एकजुट होकर बोला — “बहिष्कार!”
और प्रशासन ने उसे माना — “जनसुनवाई संपन्न!”
ये आखिर कौन-सा नया लोकतंत्र है?
ग्रामीणों की दहाड़ — “हमारी जमीन, हमारी बात — कोई दबाव नहीं चलेगा!”
ग्रामीणों का साफ आरोप —प्रशासन कंपनी की ढाल बनकर खड़ा है।भय और दबंगई के सहारे जनसुनवाई का नाम पर सिर्फ नाटक किया गया।पुलिस, कोटवार, अफसर… लेकिन जनता?
गायब!
जब अधिकारी औपचारिकता पूरी कर लौटने लगे, ग्रामीणों ने रास्ता रोककर सवाल दाग दिए —“बिना बात सुने जनसुनवाई निरस्त? और बिना सुने ही पूरी भी? यह कौन सी फाइलों की बाजीगरी है?”

🔥 कोरे कागज़ पर “जनसुनवाई निरस्त” — प्रशासन की सबसे बड़ी कलाबाजी!
एसडीएम वर्षा बंसल ने जैसे-तैसे कोरे कागज़ पर लिख दिया —
“जनसुनवाई निरस्त”
न कोई कारण, न कोई आदेश, न कोई प्रक्रिया! पर्यावरण और नोडल अधिकारी सवालों से भागते दिखे।
पत्रकारों से दूरी, ग्रामीणों से दूरी —
क्या छिपाना चाहते हैं? किसके दबाव में हैं?जनता की चेतावनी — “अब अगर हमारी आवाज़ दबाई, तो चिंगारी आग बन जाएगी!”

ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी — “अगर हमारी बात नहीं सुनी, तो आंदोलन इतना बड़ा होगा कि प्रशासन को जवाब देने का मौका भी नहीं मिलेगा!”ग्रामीणों का बहिष्कार 100% सफल रहा।और प्रशासन की विश्वसनीयता?
जमीन पर गिरकर बिखर गई! यह जनसुनवाई नहीं, जन-अनसुनी थी।जनता की भागीदारी के बिना लोकतंत्र खोखला है,और प्रशासन की यह जल्दबाज़ी खुद सवालों के घेरे में है।अब गेंद प्रशासन के पाले में है —
या जनता की सुनो… या जनता की हुंकार सुनो!
